मुलाक़ात
April 28, 2010
अरसे बाद आज मैंने खुद से मुलाक़ात की हैं,
क्या सोचता हूँ, क्यूँ सोचता हूँ, ये बात की हैं
क्यूँ बढ गई हैं बेचेनी भीतर ये बेशुमार,
या शायद बड़े होके हमने कोई गलत बात की हैं
महफ़िल कहकहो से इक बार फिर यहाँ गूजने लगी,
शायद यही कीमत यहाँ मेरे ख़यालात की हैं
ख्वाबो के पंखो पे उम्मीदे बिखरी हैं सब तरफ,
किसी ना-उम्मीद मुसाफिर ने यहाँ बसर रात की हैं
बस मुझे देने लगता हैं मेरे मुक़दर की दुहाई,
जब जब उस खुदा से कुछ मांगने की मैंने बात की हैं
क्यूँ नहीं बना लेते हो कही इक आशियाँ अपना,
चिड़िया ने बन्दर से आज फिर वही पुरानी बात की हैं
सिलसिला
April 28, 2010
चलो फिर इक बार हम ये सिलसिला शुरू करते हैं,
दूर रह के ख्यालातो की गुफ्तगू करते हैं
यूँ तो बेमानी सी होती जा रही हैं अब ये जिंदगी,
हम-राज़ बनाके तुमको, कोई माने दिया करते हैं
मैं कब हूँ काबिल नसीहत देने को यहाँ दोस्त,
इस गाँव में सुना हैं सब वाइज़ रहा करते हैं
मुझे दरकार हैं मेरी फ़रियाद सुनने वालो की,
यहाँ इस भीड़ में तो सिर्फ सुनाने वाले मिलते हैं
हर इक मोड़ पे रुक जाता हूँ मैं ये सोच कर,
कोई आवाज़ आ जाए, चलो हम साथ चलते हैं
हुई तकलीफ तो याद आया हमें आज रब अपना,
वैसे तो बच के हम मस्जिद की गालिओ से निकलते हैं