मुलाक़ात
April 28, 2010
अरसे बाद आज मैंने खुद से मुलाक़ात की हैं,
क्या सोचता हूँ, क्यूँ सोचता हूँ, ये बात की हैं
क्यूँ बढ गई हैं बेचेनी भीतर ये बेशुमार,
या शायद बड़े होके हमने कोई गलत बात की हैं
महफ़िल कहकहो से इक बार फिर यहाँ गूजने लगी,
शायद यही कीमत यहाँ मेरे ख़यालात की हैं
ख्वाबो के पंखो पे उम्मीदे बिखरी हैं सब तरफ,
किसी ना-उम्मीद मुसाफिर ने यहाँ बसर रात की हैं
बस मुझे देने लगता हैं मेरे मुक़दर की दुहाई,
जब जब उस खुदा से कुछ मांगने की मैंने बात की हैं
क्यूँ नहीं बना लेते हो कही इक आशियाँ अपना,
चिड़िया ने बन्दर से आज फिर वही पुरानी बात की हैं
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