सिलसिला
April 28, 2010
चलो फिर इक बार हम ये सिलसिला शुरू करते हैं,
दूर रह के ख्यालातो की गुफ्तगू करते हैं
यूँ तो बेमानी सी होती जा रही हैं अब ये जिंदगी,
हम-राज़ बनाके तुमको, कोई माने दिया करते हैं
मैं कब हूँ काबिल नसीहत देने को यहाँ दोस्त,
इस गाँव में सुना हैं सब वाइज़ रहा करते हैं
मुझे दरकार हैं मेरी फ़रियाद सुनने वालो की,
यहाँ इस भीड़ में तो सिर्फ सुनाने वाले मिलते हैं
हर इक मोड़ पे रुक जाता हूँ मैं ये सोच कर,
कोई आवाज़ आ जाए, चलो हम साथ चलते हैं
हुई तकलीफ तो याद आया हमें आज रब अपना,
वैसे तो बच के हम मस्जिद की गालिओ से निकलते हैं
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